हमने थोडा सोचा, थोडा समझा, और..... कुछ ठाना, कुछ माना, और जाना यह भी की... क्यों न..... कुछ दोस्त ऐसे भी बनाए जाए, जो सुर्य जैसे हो, दूर रहेके भी उष्मा दे, जीवन में जब अंधेरा छाए, तो उसे भी भगा दे, और हम जगाऐ रखे।।
मन पर थोडा भार पडा था, तब से वो बेकार पडा था। उस बेकार से मन को थोडा टटोला, दबे हुए जज्बातों को खोला। और फिर लगा कि... क्यों न खुल के कुछ ऐसे जीया जाये, इस बदले बदले मौसम और मिज़ाज का मज़ा लीया जाए।